राजस्थान में प्रमुख रीति-रिवाज – Rajasthan Ke Riti Riwaj

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राजस्थान में रीति-रिवाज Rajasthan Ke Riti Riwaj

Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz राजस्थान में कई खूबसूरत नुहा कलात्मक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं जो प्राचीन भारतीय जीवन शैली को दर्शाती हैं राजस्थान को राजपूताना (राजपूतों का देश) भी कहा जाता था यह पर्यटकों के आकर्षण और अच्छी पर्यटक सुविधाओं के साथ एक पर्यटन स्थल भी है।

भारत का यह ऐतिहासिक राज्य अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपरा, विरासत और स्मारकों के साथ पर्यटकों और छुट्टियों को आकर्षित करता है इसमें कुछ अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान भी हैं  राजस्थान का 70% से अधिक हिस्सा शाकाहारी है, जो इसे भारत में सबसे अधिक शाकाहारी राज्य बनाता है और इस राज्य में बहुत सी रीति रिवाज है और यह भारत का ऐसा राज्य है जंहा सबसे ज्यादा रीति रिवाज है आज इस artical में आपको राजस्थान के राजस्थान में रीति-रिवाज के बारे में विस्तार से बतायेंगे (Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz)

जन्म से संबंधित रीति-रिवाज (Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz)

 rajasthan ke riti riwaj

सोलह संस्कार/षोडश संस्कार:

हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं।

गर्भाधान:-

  • यह 16 संस्कारों में सबसे पहला संस्कार जिसके जरिए आत्मा कोख में आती है |
  • ,इस संस्कार में नव विवाहित स्त्री के गर्भवती होने की जानकारी मिलते ही उत्सव का आयोजन होता है।
  • यहीं से जीवन और मरण का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है।
  • मेवाड़ में इस प्रथा को बदूरात प्रथा के रूप में जाना जाता है।

पुंसवन Pumsavana

  • 16 संस्कारों (संस्कारों, संस्कारों) में से दूसरा है
  • गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने में अनुष्ठान का संस्कार मनाया जाता है|
  •  यह संस्कार के दौरान गर्भ की सुरक्षा हेतु देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। स्त्री को उस दिन उपवास करना होता है|
  • इस  दिन यह पति वट वृक्ष की छाल का रस पत्नी की नाक में डालता है।

जन्म से संबंधित रीति-रिवाज (Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz)

सीमंतोनयन:-

  • यह संस्कार गर्भावस्था छठे से आठवें मास तक किया जा सकता है |
  • इस संस्कार को आगरणी भी कहा जाता है,
  • इस संस्कार में गर्भवती महिला की माता, महिला के लिए घाट व मिठाई विषेश कर घेवर भेजती है |
  • यह गर्भवती स्त्री को अंमगलकारी शक्ति से बचाने हेतु किया जाता है।

जातकर्म Jatakarma 

  • हिन्दू धर्म संस्कारों में जातकर्म संस्कार चौथा संस्कार है।
  • यह गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है |
  • कुछ समय बाद ही उसकी जाति (लिंग) का पता चल जाता है।
  • गर्भस्थ बालक का पिता स्नान कर उसी समय जातकर्म संस्कार करता था।

नामकरण Naamkarann:-

  • यह बच्चे के जन्म के 7 दिन के बाद किया जाता है |
  • जन्म के पश्चात् बालक नामकरण निकालना। नामकरण किसी ज्योतिशी से निकालवाया जाता हैं। Rajasthan Ke Riti Riwaj

जन्म से संबंधित रीति-रिवाज

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निष्क्रमण Nishkramana:-

  • यह हिन्दू धर्म संस्कारों में निष्क्रमण संस्कार  छठां संस्कार है
  • इस संस्कार में  पिता शंख-ध्वनि और वैदिक भजनों की ध्वनि के साथ बच्चे को सूरज की ओर देखता है
  • जन्म के बाद के चौथे महीने में, बच्चे के निशकर्म को किया जाना चाहिए
  • यमस्मृति के अनुसार, बच्चे को तीसरे महीने में सूर्य और जन्म के बाद चौथे महीने में चंद्रमा को देखना चाहिए

दशोटन Dashotan:-

  • यह बच्चे को पहली बार अन्न का आहार देने कि क्रिया को कहते हैं।
  • यह सभी अपने हिसाब से करते है |

चूड़ाकरण/मुंडन Chudakarana:-

  • यह हिन्दू धर्म संस्कारों में आठवां संस्कार है |
  • बच्चे के सिर के बाल पहली बार कटवाने पर किया जाने वाला उत्सव चूड़ाकरण संस्कार कहा जाता है।

कर्णबोध:-

  • यह हिन्दू धर्म संस्कारों में नौंवा संस्कार है |
  • इस संस्कार में शिशु के कान बींधने की क्रिया की जाती है

विद्यारंभ संस्कार Vidyarambham

  • विद्यारंभ (संस्कृत: विद्यारम्भ) एक हिंदू परंपरा है
  • विद्यारम्भम (विद्या का अर्थ है “ज्ञान”, अरम्भम का अर्थ है “शुरुआत”) बच्चों के लिए मंदिरों और घरों में आयोजित किया जाता है
  • बच्चे को अक्षर ज्ञान हेतु पाँचवे वर्ष में विद्यालय भेजने क्रिया को कहते है। Rajasthan Ke Riti Riwaj

जन्म से संबंधित रीति-रिवाज

उपनयन/यज्ञोपवित/जनेऊ संस्कार:-

  • उपनयन संस्कार में जनेऊ पहना जाता है और विद्यारंभ होता है।
  • इसमें बालक गुरू के पास जाता है |

वेदारंभ:-

  • यह हिन्दू धर्म संस्कारों में  12वा संस्कार है |
  • गुरू के पास जाकर वेदों का अध्ययन करने हेतु यह संस्कार किया जाता है।

केशांत Keshanta:- 

  • जब  दाढ़ी और मूँछ को पहली बार कटाया जाता था। इस संस्कार को केशांत संस्कार कहा जाता है।
  • इस संस्कार को गोडाना (गाय देने वाला) या गोदानकर्मन (गाय देने का संस्कार) के रूप में भी जाना जाता था|

समावर्तन:-

  • गुरुकुल में शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात जब जातक की गुरुकुल से विदाई की जाती है तो आगामी जीवन के लिये उसे गुरु द्वारा उपदेश देकर विदाई दी जाती है। इसी को समावर्तन संस्कार कहते हैं Rajasthan Ke Riti Riwaj
  • ‘समावर्तन’ का शाब्दिक अर्थ है, ‘वापस लौटना’।

विवाह:-

  • विवाह मानव-समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रथा या समाजशास्त्रीय संस्था है।
  • इस संस्कार के बाद ब्रह्मचारी व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता हैं।

अंतिम संस्कार:-

  • मनुंष्य जीवन का अन्तिम संस्कार होता हैं।

विवाह के विधि-विधान (रीति-रिवाज)

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संबंध तय करना:-

  • जब विवाह के लिए रिश्ता तय करते हैं।
  • यह इसलिए किया जाता है ताकि लड़के लड़की का वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार कोई अनर्थ न हो
  • इसके अन्दर संबंध होने से पूर्व लड़की लडके की कुण्डली मिलाई जाती है। इसे गुण मिलाना कहते है।

सगाई:-

  • जब रिश्ता तय हो जाता है उसके बाद विवाह के लिए एक रूपया और नारियल देकर सगाई पक्की कर दी जाती है। वागड़ क्षेत्र में इसे सगपण कहते है।

सिंझारी:-this is a highlighted textthis is a highlighted text

  • यह सगाई के बाद किया जाता है
  • इसमें श्रावण कृष्णा तृतीया पर्व तथा इस दिन कन्या या वधू के लिए भेजा जाने वाला सामान।

टीका:-

  • जब रिश्ता तय हो जाता है और सिंझारी हो जाती है तो विवाह का दिन रखा जाता है उस दिन को टिका कहते है |

पहरावणी या चिकणी कोथळी:-

  • सगाई के बाद वर ने गणेश चौंथ पर व वधू ने छोटी व बडी तीज पर उपहार  भेजे जाते है |
  • सगाई के बाद वर पक्ष से वधू पक्ष को दिया जाने वाला सामान पहारावणी कहलाता है।

पीली चिट्ठी/लगन पत्रिका:-

  • पीली चिट्ठी के आदान प्रदान के उपरान्त विवाह तो निश्चित हो ही जाता है |
  • उसके द्वारा दोनों पक्ष अपने-अपने यहां निमंत्रण पत्र बनवाते हैं
  • एक कागज में लिखकर एक नारियल के साथ वर पिता के पास भिजवाते है जिसे लग्न पत्रिका भेजना कहते है।

विवाह के विधि-विधान

कुंकुम पत्री:-

  • लगन पत्रिका के बाद यह होता है
  • विवाह पर अपने संगे-संबंधियों  अपने दोस्तों को आमत्रित करने के लिए जो पत्र भेजा जाता है, उसे कुकुम पत्री कहते है।

इकताई:-

  • जब दर्जी वर-वधू के लिए कपड़े बनाने के लिए आता है  उनका नाप लेने के मुहू को इकताई कहते है।

छात:-

  • विवाह के अवसर पर नाई को जो  नेग  दिया जाता है उसे नेग छात कहलाता है।

पाट/बानेः-

  • जब लगन पत्रिका दोनों साइड पहुंच जाती है तो  पक्ष व वधू पक्ष दोनो के ही घरो में गणेश पूजा की जाती हैं, उसे पाट कहते हैं।

विवाह के विधि-विधान

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हल्दायत:-

  • हिन्दू धर्म के अंतर्गत होने वाली शादियों में हल्दी की रस्म को काफी महत्व दिया जाता है।
  • हल्दी और उबटन जैसे कार्यक्रम के लिए सुहागन स्त्रियों को बुलाया जाता है
  • इसमें पीठी चढाई जाती है, जो मैदा, तिल्ली का तेल व हल्दी से बनाई जाती है।
  • उसके बाद वर-वधू को स्न्नान करा कर गणेशजी व कुल देवी की पूजा कराई जाती है।

तेल चढ़ाना 

  • तेल चढ़ाना-बारात के आ जाने पर वधू के तेल चढ़ाने की रस्म की जाती है, इसे आधा विवाह माना जाता है।

यज्ञ वेदी:-

  • यह रस्म पंडित जी द्वारा की जाती है इसमें विवाह मंडप के नीचे यज्ञ वेदी बनाई जाती हैं। इसके पास में घी का दीपक जलाया जाता है। वर और वधू के विवाह संबंधी सभी मांगलिक कार्य यहीं किये जाते है।

कांकण बंधन

  • वर और वधू के दाहिने हाथ में  एक धागा बांधा जाता है जिसे कांकण बंधन कहते है

विवाह के विधि-विधान

रातिजगा:-

  • बारात रवाना होने से पहले वाली रात को  दिया जाने वाला रात्रि जागरण राति जगा कहलाता है
  • इसमें देवी देवता के भजन गाये जाते है |Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz

रोड़ी/थेपड़ी पूजनः-

  • इस रसम में बारात रवाना होने के एक दिन पहले स्त्रियाँ वर को घर के बाहर कूड़ा-कचरे की रोड़ी पूजने के लिए ले जाती है।

बतीसी/भात नूतना:-

  • इस अवसर पर वर -वधू की माता अपने पीहर वालो को निमंत्रण ओर सहयोग देने की कामना व इसे बतीसी, भात नूतना कहते है

मायरा/भात भरना:-

  • इस वर -वधू की माता की पीहर वाले अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उसे जो कुछ सहयोग देते है जिसे उसे मायरा या भात भरना कहा जाता हैं।

चाक पूजन:-

  • विवाह से पहले वधू व वर के घर की स्त्रियाँ गाजे बाजे के साथ कुम्हार के घर जाकर चाक पूजन करती है और वापिस आते समय सुहागिन स्त्रियाँ के सिर पर कलश रखा जाता है
  • और जब घर पहुंच जाते है तो घर के जंवाई द्वारा वह कलश उत्तर जाता है |

विवाह के विधि-विधान ( Rajasthan Ke Riti Riwaj)

मूठ भराई:-

  • मुठ भराई-बारातियों के बीच बैठा कर के सामने थाल में रुपए रखकर उसको मुट्ठी में लेने को कहा जाता है
  • यह रस्म इस लिए की जाती है की जिस प्रकार रोड़ी धूप, वर्षा, आंधी सहन करती है उसी प्रकार वर-वधू सहनशील बने |

बिंदौली/बिंदौरी/निकासी/जान चढ़ाना:-

  • यह विवाह के दिन किया जाता है |
  • जब विवाह के दिन वर सजी-धजी घोडी पर सवार होकर दुल्हन के घर विवाह करने जाने के लिए अपने सगे संबंधियों मित्रों के साथ वधू के घर की ओर रवाना होना जान चढ़ना कहलाता है।Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz

टूँटीया की रस्म:-

  • यह रस्म बारात जाने के बाद की जाती है |
  • यह अनूठे रस्म रिवाजों का मनोंरंजन भरा संगम हैं।
  • टूँटीया करने की शुरूआत श्री कृष्ण व रूकमणी के विवाह से मानी जाती है|

ठूमावा/आगवानी/मधुपर्क/सामेलाः-

  • जब बारात वधू के घर पहूँचने पर वधू का पिता द्वारा अपने संबंधियो का स्वागत करता है उसे सामेला  कहा जाता है |

तोरण मारना :-

  • जब वर वधू के घर के दरवाजे पर पहुंचता है तो वधू के घर के दरवाजे पर जो तोरण  बंधा होता है  वर घोड़े पर चढ़ा-चढ़ा ही तोरण को तलवार, नीम की डाली या छड़ी से मारता है। Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz

जेवड़ो:-

  • जब तोरण मने के बाद वर निचे उतरता है तो वधु की माता द्वारा वर की अपने आँचल से या रस्सी के द्वारा नापा जाता है उस रस्म जेवड़ो  खाते है |

दही देना:- 

  • जब दूल्हे की सास उसकी नापने के बाद  दही व सरसों के तेल का तिलक लगाती है इसे ही दही देना कहते है |

झाला मेला की आरती:-

  • जब वधू की माँ द्वारा दूल्हे की, आरती करती है |

विवाह के विधि-विधान ( Rajasthan Ke Riti Riwaj)

कामण:-

  • जब वधू की माँ द्वारा दूल्हे की, आरती करती उस समय जो  पीछे स्त्रियों द्वारा प्रेम भरे रसीले गीत गए जाते है उन्हें कामण कहा जाता है।

मण्डप छाना:-

  • जहाँ पर वर-वधू फेरे लेते है यह मण्डप बाँसों का बनाया जाता है।

हथलेवा जोड़ना:-

  • फेरों के बाद हथलेवा छुड़वाकर कन्यादान की रस्म होती है।
  • यह रस्म वधू का मामा के द्वारा की जाती है |
  • इस रस्म में  वधू का मामा वधू को ले जाकर वधू वर के हाथों में मेंहदी व चाँदी का सिक्का रख कर दोनों के हाथ जोड़ता है

गठबंधन:-

  • इस रस्म को पंडित जी द्वारा की जाती है |
  • गठबंधन की रस्म में पंडित जी वर और वधू के वस़्त्रों के छोर परस्पर बांधता है |

अभयारोहण:- 

  • यह रस्म फेरो से पहले होती है
  • वधू को पतिव्रत के लिए शपथ दिलाई जाती है उसको अभयारोहण कहते है।

परिणयन/फेरे/भाँवर/पळेटौ:-

  • इस रस्म में वर और वधू फेरे लेते है |
  • इस rs के बाद विवाह को सम्पन माना जाता है |

विवाह के विधि-विधान ( Rajasthan Ke Riti Riwaj)

पगधोई:

  •  पगधोई का मतलब पाँव धोना है
  • इस रस्म में वधू के माता-पिता द्वारा फेरो के बाद वर के पाँव धोते है |

कन्यादान:-

  • यह रस्म फेरो के बाद मे होती है |
  • इस रस्म में वधू के पिता द्वारा दिया जाने वाला दान कन्यादान कहलाता है।

माया की गेह:-

  • फेरो के बाद जब  वधू बहन या सहलियों द्वारा वर से हँसी मजाक करती है |

अखनाल:-

  • वधू के माता-पिता द्वारा विवाह के दिन उपवास रखा जाता है तो फेरो के बाद  वधू का मुख देखकर ही खोला जाता है।

जेवनवार/विवाह पर दिया जाने वाला भोजन:-

  • वधू के घर बारातियों को भोजन देने की प्रथा को जेवनवार कहा जाता है।

विवाह के विधि-विधान ( Rajasthan Ke Riti Riwaj)

जुआ जुई:-

  •  यह  रस्म विवाह के दूसरे दिन वर को कंवर कलेवा पर बुलाया जाता है उस समय वर-वधू को जुआ जुई खेलाया जाता है, इसे जुआ जुई या जुआछवी कहा जाता है। Rajasthan ke pramukh Riti Riwaz

मांमाटा:-

  • वधू की सास के लिए जो उपहार भेजा जाता है उसे ही मांमाटा कहलाता है।

कोयलड़ी:-

  • जब वधू की विदाई की जाती है उस समय परिवार की स्त्रियों द्वारा गीत गाया जाता है उसे कोयलड़ी कहलाता है।

सीटणा:-

  • जब मेहमान को भोजन कार्य जाता है तो समय गीत गाया जाता है उसे सीटणा खाते है |

बारणा रोकना:-

  • जब वर प्रथम बार वधू को घर लेकर आता है वर के द्वार पर वर की बहनों द्वारा प्रवेश रोकना तथा कुछ नेग  लेने के बाद ही प्रवेश देने देती है, इसे ही बारणा रोकना कहते है।

जात देना:-

  • विवाह के बाद में वर व वधू पक्ष के लोग अपने देवी-देवताओं को प्रसाद चढाते है उस रस्म को जात देना कहते है।

सोटा-सोटी खेलना:-

  • यह वर के घर की जाने वाली रस्म है |
  • इसमें  दूल्हा-दुल्हन नीम के पेड़ नीचे गोलाकार घूमते हुए नीम की टहनियों से एक दूसरे को मारते है

विवाह के विधि-विधान ( Rajasthan Ke Riti Riwaj)

ओलंदी:-

  • जब वधू के भाई उसे पहली बार लेने आते है |

ननिहारी:-

  • जो पहली बार वधू को लेने आता है उसे  ननिहारी कहा जाता है।

मांडा झाँकना:-.

  • जब दामाद विवाह के बाद पहली बार सुसराल जाता है उसे मांड़ा झाँकना कहते है |

बंदौला:-

  • जब  दूल्हा-दुल्हन परिवार में किसी के घर खाने खाने जाते है उसे  बंदौला कहते है।

मुकलावा या गौना/दहेज   :-

  •  वधू के घर वालो की तरफ से दिया जाने वाला वस्त्रादि सामान मुकलावा या गौना कहलाता है।

बढ़ार:-.

  • जब वर-वधू को आशीर्वाद समारोह स्थल प्रतिभोज दिया जाता है उसे बढ़ार कहते है।

यह भी पढ़े :राजस्थान के प्रमुख आभूषण – Rajasthan Ke Aabhushan

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